Tuesday, October 29, 2019

दीपावली पर लगा गधों का मेला फिल्मी सितारों के नाम पर लगती है लाखों की बोली


रिपोर्ट - अनुपम दाहिया

दीपावली पर लगा गधों  का मेला

फिल्मी सितारों के नाम पर  लगती है लाखों की बोली
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दीपावली त्योहार में शाॅपिंग का जलवा ही अलग रहता है क्यो कि यह खरीदारी का प्रमुख त्यौहार माना जाता है। इस दौरान बाजार में ग्राहकों को आकर्षित करने के तमाम तरह के ऑफर और डिस्‍काउंट भी मिलते है लेकिन बहुत ही कम लोगो ने सुना होगा की जिस गधे को मूर्खता का पर्याय मान सभी लोग  गाली देते हैं उसका भी व्यापार होता है और उसके खरीदारों को बकायदे डिस्काउंट भी मिलता है 
           हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी जिले की धर्मनगरी चित्रकूट में दिवाली के अवसर पर इन गधों और खच्चरों का मंदाकनी नदी के किनारे पड़े मैदान में 3 दिवसीय  ऐतिहासिक मेले का आयोजन शुरू हो चुका है दिवाली के दूसरे दिन से लगने वाले इस मेले की व्यवस्था बाकायदा नगर पंचायत द्वारा की जा चुकी  है जिससे नगर पंचायत चित्रकूट को गधा मेले से हर वर्ष लाखो रुपयों का राजस्व भी मिलता है ।       

             बताया गया है कि यहां देश के विभिन कोने से हजारो की संख्या में अलग अलग नस्लो के गधे खच्चरों को लेकर  व्यापारी आते है जहा 3 दिन में लाखो का व्यापार होता है। 
         इस गधा बाज़ार में आने वाले व्यापारियों को कभी मुनाफा तो कभी घाटा भी  उठाना पड़ता  है । क्यो कि  यह मांग और पूर्ति के बाज़ार पर निर्भर होता है । 

मुगल काल से हुई थी शुरूआत
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मिली जानकारी के अनुसार इस गधा मेला की शुरूआत  सर्व प्रथम मुगल काल में हुई थी। 
     कहते है  मुगल बादशाह औरंगजेब के सैन्य बल में घोड़ों की कमी होने पर जब  अफगानिस्तान से बिकने के लिए अच्छी नस्ल के खच्चर व गधे बुलबाए गए और उन्हे मुगलसेना के बेड़े में शामिल किया तो उनकी खरीदी इसी चित्रकूट के हाट से हुई थी। तब से चली आ रही इस ऐतिहासिक मेले की यह  अनवरत परम्परा आज भी जारी है और इसीलिए इस​ मेले का अत्यधिक ऐतिहसिक महत्व भी है।

देश के विभिन्न कोनो  से आते हैं लोग
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इस मेले में  मध्यप्रदेश के विभिन्न जिलों के अलावा उत्तर प्रदेश छत्तीसगढ, राजस्थान,पंजाब, हरियाणा, बिहार, जम्मू कश्मीर, से खच्चरों व गधों को खरीदने और बेचने के लिए व्यापारी आते हैं ।
       व्यापारियों की माने तो गधो व खच्चरों की यहा पर अच्छी खाशी कीमत मिलती है और चित्रकूट का ​मेला खरीदी एवं बिक्री के लिए सबसे अच्छा माना जाता है ।  हालांकि अब यहां भी कुछ आव्यवस्थाये होने लगी है जिससे व्यापारियो को परेसान भी होना पड़ता है

अभिनेताओं के नाम पर मिलती है अच्छी कीमत
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इस मेला में आने वाले गधों के नाम भी व्यापारी बड़े अजीबो गरीब ढंग के रखते है  जिनमे अक्सर फिल्म जगत के कलाकारों के नामो की बाहुलता होती है । उदाहरण के लिए सलमान,साहरुख,दीपिका,रणवीर,अक्षय,गोविंदा,मिथुन, सनी, हनी, महिमा,पारूल, नगीना, हीना, टाइगर, आदि जो किसी न किसी अभिनेताओं के नाम पर होते है। और फिर उनकी कीमत भी नाम एवं खूब सुरती के अनुसार आंकी जाती है। हालांकि नाम के साथ  इनकी कीमत में उम्र व दांतो की गिनती भी शामिल होती है ।


घास खिलाने से कष्ट दूर होता है
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 लोक मान्यता के आधार पर इस गधा मेले में आसपास के गाव के लोग यहां आकर गधो को घास खिलाने आते है । उनका मानना है कि  ऐसा करने से परिवार के सभी कष्ट दूर हो जायेगे व उन्हें पुण्य  मिलेगा

खतरे में मेले का अस्तित्व
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 धर्म नगरी चित्रकूट के मंदाकिनी नदी के तट पर लगने वाले इस ऐतिहासिक गधा मेले मे कम होती गधा व्यापारियो ,खरीदारों की संख्या व आधुनिक मशीनरी उपयोग  को मिलरहे बढ़ता  एवं वैश्विक मंदी के चलते उसका असर अब जानवरों के इस मेले में भी दिख रहा है। जिससे धीरे धीरे  मेले का अस्तित्व भी खतरे मे  पड़ता दिखाई देने लगा  है ।  यदि गधा मेले की इसी तरह अनदेखी  की जाती रही तो निकट भविष्य में यहा इस गधा मेला के खत्म होने मे बहुत देर नही लगेगी ।

Monday, October 28, 2019

किसानों को बड़ी राहत | रीवा के बाद अब सतना में भी ऐरा प्रथा पर रोक


किसानों को बड़ी राहत- 

रीवा के बाद अब सतना में भी ऐरा प्रथा पर रोक

     किसानों को कलेक्टर ने बड़ी राहत दे दी है। फसलों के लिए अभिशाप बन चुके ऐरा प्रथा पर कलेक्टर ने रोक लगा दी है।प्रतिबंधात्मक आदेश जारी कर दिया है। अब सड़कों पर आवारा मवेशी घूमते मिले तो पशु मालिकों पर पशु क्रूरता निवारण अधिनियम के तहत प्रकरण दर्ज होगा।

         जिला कलेक्टर डॉ सतेंद्र सिंह ने
आवारा पशुओं से फसलों की क्षति व सार्वजनिक स्थलों में पशुओं के यत्र तत्र घूमने के कारण होने वाले नुकसान की रोकथाम के उद्देश्य से प्रतिबंधात्मक आदेश जारी किया है। जिला दण्डाधिकारी ने आदेश में कहा है मवेशियों को बिना चरवाहे के छोड़ने की ऐरा प्रथा के कारण पशुओं के यहां-वहां घूमने से किसानों की फसलों को नष्ट  करते हैं। ऐसे में आक्रोशित किसानो के द्वारा पशुओं के साथ क्रूरता की जाती है। सड़क  में पशु दुर्घटनाग्रस्त होकर मृत अथवा घायल हो जाते हैं । इससे लोगों की आस्था प्रभावित होगी है। कानून व्यवस्था बिगड़ती है। इन स्थितियों को ध्यान में रखकर कलेक्टर ने प्रतिबंधात्मक आदेश जारी किया कर दिया है। इससे  लाखो आवारा पशु सड़कों से हटेंगे। किसानों की फसल बर्बाद होने से बचेगी।


फोटो-सड़क पर आवारा मवेशियों के जमघट

बाहरी हार्वेस्टर की इंट्री पर रोक।   

इसके साथ ही  पराली जलाने को पूर्णत: प्रतिबंधित कर दिया है। इसके अलावा हार्वेस्टर की अनुमति उसी शर्त पर दी जायेगी जब उसके साथ भूसा कटाई की मशीन जैसे रीपर का प्रयोग किया जाएगा। भूसा कटाई मशीन के बिना हार्वेस्टर का प्रयोग पूर्णत: प्रतिबंधित रहेगा।

घर-घर जाकर विधिवत होगा सर्वे

कलेक्टर ने पशुपालन विभाग के अधिकारी- कर्मचारी को पशु पालक के घर-घर जाकर पशुओं की टैगिंग के निर्देश दिए हैं। इससे यह पता चलेगा कि संबंधित पशु का मालिक कौन है। पालकों के पशुओं को ऐरा छोड़ने तथा दुर्घटना होने को उन पर पशु क्रूरता निवारण अधिनियम
के तहत प्रकरण दर्ज कराया जायेगा।

समाप्त होने की कगार पर गावो का अनुष्ठानिक ;बरेदी नृत्य;



समाप्त होने की कगार पर गावो का अनुष्ठानिक  "बरेदी नृत्य" 

    दीपावली कई पौराणिक मान्यताओं का पर्व है। एक ओर इसमें जहॉ राम के बनबास पूरा कर के अयोध्या वापस आने की कथा जुड़ी है ,वही श्री कृष्ण के इंद्र की पूजा के बजाय गोवर्धन पूजा से जुड़ा एक प्रसंग भी है।किन्तु तीसरी ओर आदिबासी समुदाय भी दीपावली से देव् अनुष्ठानी एकादसी तक अपना जन्त्र मंत्र जगाता है।उधर बौद्ध धर्मावलंबियों का भी एक तर्क है कि दीपावली को दीप जलाने की परम्परा सम्राट अशोक के कलिग बिजय के बाद शुरू हुई। इस तरह यह ऐसा त्यौहार है जिसमे अनेक लोक मान्यताएं समाहित है। पर अब कई परम्पराए धीरे धीरे समाप्त सी होती जा रही है। पर अभी कुछ ग्रामीण क्षेत्रो में देखने को मिल रही है ।

      पहले दीपावली से एकादसी तक यादव समुदाय पूरे 10 से 12 दिनों तक उत्सव मनाता था। गाव गाव उनकी टोली डोर पहन, पैरों में घुघरू बाध और हाथ में मोर पंख से बंधी लाठी लेकर बरेदी नृत्य करती । वे बीच बीच में लाठी युद्ध की अपनी पटे बाजी भी दिखाते जाते।  यह परम्परा छत्तीशगढ़ तक थी । उसे वहां राउत नाचा नाम से जाना जाता है।

फोटो- लाठी युद्ध 

        इस नृत्य में वे श्री कृष्ण के प्रेम प्रसंगों य दधी दान से सम्बंधित दिवाली का गीत भी गाते थे। उनका यह सारा अनुष्ठान देवरी जगाना नाम से जाना जाता था। पर कुछ वर्षो से यह पूर्णतः समाप्त सा था।पर अब कुछ वर्षों से पुनः गांवों में एक टोली आने लगी है वह गांवों में पहुचकर अपना देवरी जगाने का अनुष्ठानिक नृत्य दिखाते फिरते हैं।






काश ! आत्म निर्भर गाँव की वही दिवाली लौट आती ? स्मरण @पद्मश्री बाबूलाल दाहिया

@ स्मरण 

स्मरण @ पद्मश्री बाबूलाल दाहिया
मो -9981162564

काश !  आत्म निर्भर गाँव की वही दिवाली लौट आती ?

            आज दीपावली है। मुझे जहाँ तक स्मरण है मैं 1950 से हर साल दीपावली मनाता आ रहा हूं। उस समय मैं 7 साल  का था। हमारे उस जमाने मे आज जैसे बम्म पटाखे छुरछुरी नही थे। पर पडाके हम भी फोड़ते थे। 
        इसके लिए हमारे साथी  खोखले बांस की एक पोगड़ी बनाकर  क्यांच नामक पौधे के फल को उस बॉस के खोल में डालते और एक अन्य सीधी लकड़ी को जैसे ही पिचकारी की तरह उसे ठेलते तो उस पोगड़ी से बड़े जोर से पडाक की आवाज निकलती। उस स्वनिर्मित यंत्र से निकली पडाक की आवाज में जो आनंद य उल्लास की अनुभूत होती वह बाद में किसी भी बम्म पटाखे में नही दिखी। 
           जब अन्दर दीप जल जाते तो बाहर हम लोग अंड बिजोरा ,, जट्रोफा,, के बीज की गिरी को किसी तार य लकड़ी में पिरो लेते और उसे जलाते तो एक के बाद एक वह घण्टो  प्रकाश देता रहता।

    
                मेरा ख्याल है कि शहर वालो ने उसी की नकल में बम्म पटाखे छुरछुरी आदि बनाया होगा।
        मैं स्कूल में दाखिला ले चुका था पर दशहरा से दीपावली तक उन दिनों 28 दिन की फसली छुट्टी होती जिसमें हम लोग धान की गहाई और ज्वार की तकाई में परिवार की मदद करते ,गाय बैलो को खरिक ले जाते और हम उम्र साथियो के साथ खूब मौज मस्ती करते।
        मुझे उन दिनों का गाँव के तमाम कुटीर उद्द्मियो का ब्यावसायिक ताना बाना देख ऐसा लगता है कि होली और दीवाली पूरी तरह कृषक संस्कृति से उपजे   नई फसल आने के आनन्द उल्लास के त्योहार है।
        मेरे परिवार में उस समय माता पिता, बड़े भाई भाभी और 1 मुझ से बड़ी बहन इस तरह 6 सदस्य ही थे। किन्तु  दो गाय एवं 4 बैल थे । और वह सब उन दिनों की संस्कृति में हमारे परिवार के सदस्य जैसे ही थे।
     मुझे वह दीपावली इसलिए याद है कि उस दिन सब के घर में तो दिया जले थे और सभी लोगो के गाय बैल  दूसरे दिन सुबह गेरू से रगे सींग तथा मोहरा सिगोटी पहन कर खरिक गए थे । पर न तो हमारे यहां दीप जले थे न  ही हमारे गाय बैलो की सींग रगी गई थी।

        मैंने घर आकर माँ से इसका कारण पूछा तो उनने बताया कि ,, दिवाली के दिन तुम्हारे काका  का बछड़ा मर गया था इसलिए दीवाली हमारे यहां खुनहाव मानी जाती है। ,,बाद में घर की पोताई झराई दीपक जलाने आदि की रस्म एकादसी को पूरी हुई थी। पर कितना सम्मान था उन दिनों गाय बछड़ो का कि चाचा के घर भी बछड़ा मर जाए तो त्योहार खुनहाव।
        दूसरे दिन पिता जी एक टोकने में अनाज लेकर बैठ गए थे और जितने भी गाँव के वरगा वाले उद्दमी आये थे सभी को खुसी खुसी निर्धारित मात्रा मे अनाज दिया था। इस अनाज देने की त्योहारी  रस्म को पेनी कहा जाता था। पर जब मैंने बड़े भइया से इसका मतलब पूछा तो उनने उसे पोनी परजा कहे जाने वालों के  दारू पीने का त्योहारी उपहार बताया था।
           किन्तु न तो खरिक में अब वह गेरू से रंगी चंगी गाय दिखती न मोहरा सिगोटी से अलंकृत बैल। उन सहायक उद्द्मियो और कृषक पुत्रो ने भी उस पुराने अलाभकारी उद्दम और खेती को जी का जंजाल समझ भोपाल इंदौर ,गुजरात मुम्बई का रास्ता पकड़ चुके है। क्योकि गाँव का अर्थ शास्त्र अब एक दश टोका की बाल्टी की तरह है कि गाँव का पैसा बिभिन्न रास्ते से शहर रूपी कुएं में ही केंद्रित हो रहा है।
         अलबत्ता जब गाँव के यह सभी करतूती त्योहारों में घर आते है तो  उनके द्वारा लाये गये शहर के बम्म पटाखे रंग बिरंगी मूर्तियां झालरे आदि की भरमार और चटक मटक अवश्य कुछ दिनों केलिए गाँव मे दिखने लगती है।
पर वस्तुतः गाँव मे वह आत्मनिर्भरता की ठोसाई नही है । सब कुछ दिखावटी है। 
          क्यो कि अब अपना हिंदुस्तान गाँव मे नही शहर में बसता है और शहर का लाया ही तरह तरह का जहर  खाता है।

दीपोत्सव पर तमसो मा ज्योतिर्गमय का मंत्र चरितार्थ करें- विजयशंकर चतुर्वेदी



दीपोत्सव पर तमसो मा ज्योतिर्गमय का मंत्र चरितार्थ करें
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आलेख - विजयशंकर चतुर्वेदी-
          वरिष्ठ पत्रकार 

                  दीपावली बृहदारण्यकोपनिषद् (1.3.28) के ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ वाले मंत्र को चरितार्थ करने वाला प्रकाश पर्व है. यह मनुष्य की तबीयत से पत्थर उछालने की सामूहिक कोशिश भी है. अमावस्या की रात में जब आसमान गहन अंधकार से आच्छादित होता है, धरतीवासी मनुष्य माटी के दीयों का गौरव दर्शाकर उस अंधकारा को तोड़ने का हौसला दिखाता है. ये छोटे-छोटे दीपक युगों-युगों से उस विराट शक्ति के ज्वलंत प्रतीक बने हुए हैं जो भीतर के उजाले से बाहर के अंधेरे की परतों को काटती आई है. बेशक हिंदू, जैन, बौद्ध, सिख धर्मों में दीपावली मनाने की शुरुआत से संबंधित अलग-अलग धार्मिक, पौराणिक कथाएं और किंवदंतियां प्रचलित हैं, लेकिन इन सभी के मूल में बुराई पर अच्छाई की विजय, स्वागत, हर्ष और उल्लास की भावना छिपी हुई है.

           ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाए तो ‘दीपदानोत्सव’ का वर्णन तीसरी सदी के बौद्धग्रंथ ‘अशोकावदान’ में मिलता है, जिसे सम्राट अशोक ने अपने पूरे सामाज्य में 258 ईसा पूर्व में मनाना शुरू किया था. तीसरी सदी ईसा पूर्व की सिंहली बौद्ध ‘अट्ठकथाओं’ को आधार बनाकर पांचवीं सदी के भिक्खु महाथेर द्वारा रचित ‘महावंस’ में उल्लेख आता है कि तथागत बुद्ध जब अपने पिता राजा शुद्धोदन के आग्रह पर कार्तिक माह की अमावस्या को कपिलवस्तु पधारे तो नगर वासियों ने उनके स्वागत में पूरे नगर को दीपों से सजाया था. लेकिन आज लंकाविजय के पश्चात भगवान राम, माता सीता और भैया लक्ष्मण की अयोध्यावापसी और दीपमालाओं से उनके स्वागत से जुड़ी कथा सबसे अधिक प्रचलित है. यह भारत समेत दुनिया भर में बसे हिंदुओं का सबसे बड़ा त्योहार बन चुका है.

असत्य से सत्य की ओर यात्रा का श्रीगणेश तब तक संभव नहीं है, जब तक इसके मार्ग में अहंकार और वैमनस्य रूपी दुर्धर्ष बाधाएं खड़ी हों. अहंकार के चलते ही आज हम प्रदूषण की चिंता किए बगैर इतने पटाखे चलाते हैं कि मुंबई जैसे महानगर में दीपावली की अगली सुबह धूम्रपान न करने वाला व्यक्ति भी 113 सिगरेट के बराबर धुंआ पीने को मजबूर हो जाता है. धार्मिक वैमनस्य की भावना से ही हम सुप्रीम कोर्ट द्वारा पटाखों की तीव्रता पर लगाई गई पाबंदी की धज्जियां उड़ा देते हैं. क्या हम यह कल्पना भी कर सकते हैं कि जिस तरह की परेशानी इस पटाखेबाजी के चलते मनुष्यों को होती है उससे कहीं अधिक कष्ट पशु-पक्षियों को हो सकता है. वे भी पटाखों और रॉकेटों की जद में आकर मरते हैं, जख़्मी होते हैं. लेकिन हम तो यह सोचकर धन्य हो लेते हैं कि मेरे पटाखे की आवाज पड़ोसी के पटाखे से अधिक धमाकेदार रही!

पटाखों के धमाके सुनकर कुत्ता, बिल्ली, गाय, बैल और बकरी जैसे पालतू जानवरों में भगदड़ मच जाती है. पक्षी घबराहट में अपने-अपने ठिकाने छोड़कर सुरक्षित और शांत जगहों की तलाश में उड़ जाते हैं. अक्सर यह देखा गया है कि पशु-पक्षियों में पटाखों के धुएं का बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है. वे सांस लेने में अड़चन महसूस करते हैं, भय के कारण जहां जगह मिली वहीं दुबक जाते हैं, कई बार खुद पर से नियंत्रण खो देते हैं और पटाखों की लड़ी पर ही जा बैठते हैं, कई दिनों के लिए खाना-पीना छोड़ देते हैं और पालतू व्यवहार छोड़कर चिड़चिड़े भी हो जाते हैं. इनमें से कई छोटे पक्षी तो तेज आवाज न सह पाने के कारण हृदयाघात से जान गंवा देते हैं. यह भी देखने में आता है कि पटाखों की आवाज और धुएं से घबरा कर बाहर घूमने वाले कुत्ते-बिल्लियां, गाय-बैल और दूसरे पशु बिदक कर दीवार से जा टकराते हैं, गड्ढों में जा गिरते हैं, गाड़ियों के नीचे आ जाते हैं, खम्भों से टकरा जाते हैं.

          आंकड़े बताते हैं कि दीवाली के आस-पास पशुओं की मौतों में 10-15% का इजाफा हो जाता है. आप भी ध्यान देंगे तो पाएंगे कि लगातार पटाखे फोड़े जाने से आपकी बिल्डिंग के आस-पास घूमते रहने वाले कई कुत्ते-बिल्लियां और पक्षी कुछ समय के लिए गायब हो गए हैं, घरों में पल रहे कुत्ता-बिल्ली उतने स्वच्छंद नहीं दिख रहे, पिंजरे के तोता-मैना खामोशी अख्तियार किए हुए हैं या अधिक ही कर्कश हो उठे हैं. ध्वनि सुनने के मामले में पशु-पक्षी मनुष्य से कहीं अधिक संवेदनशील होते हैं इसलिए उनको तेज आवाज से अधिक तकलीफ होती है. ऐसे में उनकी दिनचर्या बदल जाती है और खाने-पीने का समय भी बदल जाता है और इसका नतीजा यह होता है कि वे गंभीर रूप से बीमार पड़ जाते हैं.


         मुंबई के तबेले वालों का अनुभव यह रहा है कि पटाखों की आवाज से घबराकर गाय-भैंसें अपने थन खींच लेती हैं जिससे दीवाली के समय दूध का उत्पादन घट जाता है. कई बार तो वे दुहने भी नहीं देतीं. पटाखों के धुएं से इन पशुओं की श्वांसनलिका में संक्रमण का खतरा भी उत्पन्न हो जाता है. संकट यह भी है कि ध्वनि एवं वायु प्रदूषण से पक्षियों को होने वाले नुकसान की नापजोख करने का भारत में कोई तंत्र ही मौजूद नहीं है इसलिए ठीक-ठीक नहीं बताया जा सकता कि दीवाली के समय या बाद में इसका पक्षियों पर कितना दुष्परिणाम होता है. लेकिन यह तय है कि कबूतर, गौरैया, कौवा, गलगल और तोता जैसे पक्षी बड़ी संख्या में दीवाली के समय स्थलांतर करते हैं और यही वह समय होता है जब हमारे रॉकेटों से टकराकर उनके घायल होने की आशंका अधिक होती है.


दीपावली खेती, व्यापार और सामाजिक जीवन से जुड़ा सार्वजनिक महापर्व है. इसे पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाएं, लेकिन ध्यान रहे कि ऐसी जगहों पर पटाखे और रॉकेट न चलाए जाएं, जहां पशु-पक्षियों का बसेरा हो. घर में कुत्ता-बिल्ली पाल रखे हों तो शोर होते वक्त दरवाजे-खिड़कियां बंद रखें, खाना-पीना छोड़ने की स्थिति में उन्हें पशु-चिकित्सक को दिखाएं, उनके खाने-पीने का समय बदल कर देखें और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि घर के अंदर बच्चों को पटाखे बिल्कुल न चलाने दें. घर में पटाखे चलाने पर तो ध्वनि और वायु प्रदूषण के चलते परिजनों के साथ-साथ पालतू पशु-पक्षियों की जान पर भी बन आएगी.

साभार@-  
https://abpnews.abplive.in/blog/vijayshankar-chaturvedi-blog-on-diwali-festival-1226734

Sunday, October 27, 2019

काश ! आत्म निर्भर गाँव की वही दिवाली लौट आती ? बाबूलाल दाहिया


काश !  आत्म निर्भर गाँव की वही दिवाली लौट आती ?

आलेख- बाबूलाल दाहिया

            आज दीपावली है। मुझे जहाँ तक स्मरण है मैं 1950 से हर साल दीपावली मनाता आ रहा हूं। उस समय मैं 7 साल  का था। हमारे उस जमाने मे आज जैसे बम्म पटाखे छुरछुरी नही थे। पर पडाके हम भी फोड़ते थे। 
          इसके लिए हमारे साथी खोखले बांस की एक पोगड़ी बनाकर  क्यांच नामक पौधे के फल को उस बॉस के खोल में डालते और एक अन्य सीधी लकड़ी को जैसे ही पिचकारी की तरह उसे ठेलते तो उस पोगड़ी से बड़े जोर से पडाक की आवाज निकलती। उस स्वनिर्मित यंत्र से निकली पडाक की आवाज में जो आनंद य उल्लास की अनुभूत होती वह बाद में किसी भी बम्म पटाखे में नही दिखी। 
          जब अन्दर दीप जल जाते तो बाहर हम लोग अंड बिजोरा ,,जट्रोफा,, के बीज की गिरी को किसी तार य लकड़ी में पिरो लेते और उसे जलाते तो एक के बाद एक वह घण्टो  प्रकाश देता रहता।
      मेरा ख्याल है कि शहर वालो ने उसी की नकल में बम्म पटाखे छुरछुरी आदि बनाया होगा।
        मैं स्कूल में दाखिला ले चुका था पर दशहरा से दीपावली तक उन दिनों 28 दिन की फसली छुट्टी होती जिसमें हम लोग धान की गहाई और ज्वार की तकाई में परिवार की मदद करते ,गाय बैलो को खरिक ले जाते और हम उम्र साथियो के साथ खूब मौज मस्ती करते।

         मुझे उन दिनों का गाँव के तमाम कुटीर उद्द्मियो का ब्यावसायिक ताना बाना देख ऐसा लगता है कि होली और दीवाली पूरी तरह कृषक संस्कृति उपजे   नई फसल आने के आनन्द उल्लास के त्योहार है।
      मेरे परिवार में उस समय माता पिता, बड़े भाई भाभी और 1 मुझ से बड़ी बहन इस तरह 6 सदस्य ही थे। किन्तु दो गाय एवं 4 बैल थे । और वह सब उन दिनों की संस्कृति में हमारे परिवार के सदस्य जैसे ही थे।
    मुझे वह दीपावली इसलिए याद है कि उस दिन सब के घर दिया जले थे और सभी लोगो के गाय बैल उस दीपावली के दूसरे दिन गेरू से रगे सींग तथा मोहरा सिगोटी पहन कर खरिक गए थे । पर न तो हमारे यहां दीप जले थे न  ही हमारे गाय बैलो की सींग  रगी गई थी।
      मैं ने घर आकर माँ से इसका कारण पूछा तो उनने बताया कि ,, दिवाली के दिन तुम्हारे काका  का बछड़ा मर गया था इसलिए दीवाली हमारे यहां खुनहाव मानी जाती है। ,,बाद में घर की पोताई झराई दीपक जलाने आदि की रस्म एकादसी को पूरी हुई थी। पर कितना सम्मान था उन दिनों गाय बछड़ो का कि चाचा के घर भी बछड़ा मर जाए तो त्योहार खुनहाव।
      दूसरे दिन पिता जी एक टोकने में अनाज लेकर बैठ गए थे और जितने भी गाँव के वरगा वाले उद्दमी आये थे सभी को खुसी खुसी निर्धारित मात्रा मे अनाज दिया था। इस अनाज देने की त्योहारी  रस्म को पेनी कहा जाता था। पर जब मैंने बड़े भइया से इसका मतलब पूछा तो उनने उसे दारू पीने का त्योहारी उपहार बताया था।
        किन्तु न तो खरिक में अब वह गेरू से रंगी चंगी गाय दिखती न मोहरा सिगोटी से अलंकृत बैल। उन सहायक उद्द्मियो और कृषक पुत्रो ने भी उस पुराने अलाभकारी उद्दम और खेती को जी का जंजाल समझ भोपाल इंदौर ,गुजरात मुम्बई का रास्ता पकड़ चुके है।
क्योकि गाँव का अर्थ शास्त्र एक दश टोका की बाल्टी की तरह है कि गाँव का पैसा बिभिन्न रास्ते से शहर रूपी कुएं में ही केंद्रित हो रहा है।
    अलबत्ता जब गाँव के यह सभी करतूती त्योहारों में घर आते है तो  उनके द्वारा लाये गये शहर के बम्म पटाखे रंग बिरंगी मूर्तियां झालरे आदि की भरमार और चटक मटक अवश्य गाँव मे दिखने लगती है।
पर वस्तुतः गाँव मे वह आत्मनिर्भरता की ठोसाई नही है । सब कुछ दिखावटी है। 
     क्यो कि अब अपना हिंदुस्तान गाँव मे नही शहर में बसता है और शहर का लाया ही तरह तरह का जहर खाता है।





Saturday, October 26, 2019

धरती हिलती है और पत्थर बजता है।

3 वर्ष पहले 26 अक्टूबर 2016 को मैनपाट अम्बिकापुर छत्तीसगढ़ यात्रा पर धरती हिलने और ठिनठिना पत्थर के बारे में स्मरण  ।

📝 अनुपम दाहिया

धरती हिलती है और पत्थर बजता है।
         सुनने में आश्चर्य पर अंबिकापुर छत्तीसगढ़ के  मैनपाट  नामक पठार के ऊपर जलजला  स्थान है । जहाँ जमीन पर उछलने पर  आसपास की जमीन पर कम्पन का अनुभव उतपन्न होता है  यह जगह  लंबे समय से लोगों की दिलचस्पी का केंद्र है यदि खड़े होकर थोड़ा भी जम्प करे तो।  
ठीक उसी तरह,जैसा किसी गद्दे पर उछलने से महसूस हो सकता है। 
       जमीन पर कूदते ही वह धंसती है और गेंद की तरह वापस ऊपर आ जाती है। कुदरत के इस खेल को देखने  बाहरी लोग दिन भर पहुंचते रहते हैं और  कुछ देर तक बच्चों की तरह उछलते रहते हैं। पर यह सिर्फ 3 - 4 हैक्टर क्षेत्र भर में ऐसा है ।
 इसे तार से फ्रेन्सिंग कर छत्तीसगढ़ पर्यटक बिभाग ने घेर रखा है।। 

मैंनपाट का पठार लगभग 40 किलोमीटर लम्बा और 30 किलोमीटर चौड़ा व पचमढ़ी के बरावर ही ऊँचा है। जहाँ चढ़ने पर आक्सीजन की कमी के कारण घुटन सी महसूस होती है पर वहा बसने बाले माझी और उराव आदिवासी आराम से निवास करते है। यह जरूर है कि उनकी शारीरिक संरचना दुबली पतली और ऊँचाई 5 फीट से ऊपर नही है।
           
इसी तरह  पहाड़ी के नीचे मैदानी भू भाग दरिमा हवाई पट्‌टी के पास एक बहुत पुराना पत्थरो की ढेर है उनमे बाकी पत्थरो से तो खट खट की आवाज आती है पर ऊपर वाले पत्थर  से खन्न खन्न और टन्न टन्न की ध्वनि निकलती है टकराने वाली चीज की हार्डनेस और मैटलिक कंटेंट के आधार पर आवाजें भी अलग-अलग निकलती हैं  हालांकि सारी आवाजें सरल भाषा में टनटनाहट जैसी होती हैं। इस विलक्षणता के कारण इस पत्थरो को अंचल के लोग ठिनठिनी पत्थर कहते है। इसे लेकर आसपास कई तरह के किस्से- कहानियां हैं। कुछ लोग इसे चमत्कार तो कुछ दूसरे ग्रह या उल्का का पत्थर भी मानते हैं।
पर हर चमत्कारी चीजो  के पीछे भी कोई न कोई बैज्ञानिक कारण होता है।

 
पत्थर के बजने को मेरे दादा जी ने बताया कि उस पत्थर के दोनों सिरा एक बड़े पत्थर में रखे है पर बीच में पोला गैप उसके बजने का कारण होगा ।

 इसी तरह हिलने वाली जमीन को उनने बताया कि वह पुरानी झील रही होगी जहाँ सघन सरई के पेड़ो के पत्ते आकर भठ गए तथा बह बह कर आई मिट्ठी की एक पर्त ने उसे दल दल बना दिया जिस के ऊपर घास जम आई पर नीचे पानी और पत्तो की पर्त होने के कारण ऊपरी सतह हिलने लगी।
   आप भी धरती हिलने और ठिनठिना पत्थर की फोटो  और वीडियो  देखिये